Divya Mittal Politics: दिव्या मित्तल के राजनीति में आने पर ओमप्रकाश राजभर की टिप्पणी से बहस, क्या कोई नेता बना IAS?

HIGHLIGHTS
लखनऊ : पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने सक्रिय राजनीति में आने का संकेत देकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा पैदा कर दी है। उनके प्रशासनिक अनुभव और सार्वजनिक जीवन में नई भूमिका को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर की दिव्या मित्तल को लेकर की गई टिप्पणी भी चर्चा में आ गई। राजभर ने कहा था कि IAS बनना आसान है, लेकिन नेता बनना आसान नहीं है। इस टिप्पणी को लेकर राजनीतिक और सोशल मीडिया चर्चाओं में कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं।
कुछ लोगों का तर्क है कि देश में ऐसे कई अधिकारी रहे हैं जिन्होंने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने के बाद चुनावी राजनीति का रास्ता चुना। वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या इसका उल्टा उदाहरण मिलता है—यानी कोई स्थापित राजनेता राजनीति छोड़कर IAS या IPS जैसी अखिल भारतीय सेवाओं में चयनित हुआ हो?
क्या नेता से अफसर बनने का कोई बड़ा उदाहरण है?
यह सवाल सुनने में सरल है, लेकिन इसका जवाब देने के लिए IAS और IPS की भर्ती व्यवस्था को समझना जरूरी है।
सिविल सेवाओं में प्रवेश के लिए संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC की प्रतियोगी परीक्षा और निर्धारित पात्रता प्रक्रिया से गुजरना होता है। किसी व्यक्ति का राजनीतिक जीवन अपने आप उसे सिविल सेवा में प्रवेश से वंचित नहीं करता, लेकिन चयन के लिए उसे उस समय लागू सभी नियमों और प्रतियोगी प्रक्रिया को पूरा करना होता है।
आजादी के बाद भारतीय राजनीति में ऐसे नेताओं के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति से अलग होकर दूसरे क्षेत्रों में काम किया। लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक उदाहरणों में किसी प्रमुख सक्रिय राजनेता के राजनीति छोड़ने के बाद UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास करके IAS या IPS बनने का व्यापक रूप से स्थापित उदाहरण सामने नहीं आता।
इसके विपरीत प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने वाले लोगों के उदाहरण कई राज्यों और राष्ट्रीय राजनीति में देखने को मिलते हैं।
IAS और IPS से राजनीति में आए कई चेहरे
भारत में प्रशासनिक और पुलिस सेवा के अधिकारियों का चुनावी राजनीति में प्रवेश कोई नई घटना नहीं है। अलग-अलग समय पर कई अधिकारियों ने नौकरी पूरी करने, इस्तीफा देने या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद राजनीतिक दलों का दामन थामा।
पीएल पुनिया
उत्तर प्रदेश कैडर के पूर्व IAS अधिकारी पीएल पुनिया प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में सक्रिय हुए। वह कांग्रेस से जुड़े और संसद तक पहुंचे। वह लोकसभा सदस्य रहने के साथ राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
आलोक रंजन
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन का नाम भी प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने वाले अधिकारियों में लिया जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी से राजनीतिक भूमिका शुरू की। वह राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के उम्मीदवार भी रहे।
असीम अरुण
पूर्व IPS अधिकारी असीम अरुण ने पुलिस सेवा से वीआरएस लेने के बाद 2022 में भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने कन्नौज सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। वह उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं।
चंद्रपाल
पूर्व IAS अधिकारी चंद्रपाल ने सरकारी सेवा के बाद राजनीतिक क्षेत्र में अपनी अलग पार्टी बनाने का प्रयास किया। उन्होंने आदर्श समाज पार्टी का गठन किया था। हालांकि चुनावी राजनीति में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
राम बहादुर
पूर्व IAS अधिकारी राम बहादुर ने भी प्रशासनिक सेवा के बाद चुनावी राजनीति का रास्ता चुना। उन्होंने 2017 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा। बाद में वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए।
विजय शंकर पांडेय
पूर्व IAS अधिकारी विजय शंकर पांडेय ने भी सरकारी सेवा से अलग होने के बाद सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उन्होंने लोक गठबंधन पार्टी बनाई और 2019 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट से चुनाव लड़ा था।
अमिताभ ठाकुर
पूर्व IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर का नाम भी प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने वाले लोगों में शामिल है। सरकार द्वारा अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने के बाद उन्होंने राजनीतिक संगठन बनाया। वर्ष 2021 में उन्होंने आजाद अधिकार सेना नाम से राजनीतिक दल की शुरुआत की।
एसआर दारापुरी
पूर्व IPS अधिकारी एसआर दारापुरी ने भी पुलिस सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। वह ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट से जुड़े और सामाजिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहे।
सुलखान सिंह
उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP और 1980 बैच के IPS अधिकारी सुलखान सिंह भी सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में आए। नवंबर 2023 में उन्होंने बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी के गठन की घोषणा की। उनकी राजनीतिक गतिविधियों में अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग प्रमुख मुद्दा रही है।
ब्रजलाल
पूर्व IPS अधिकारी और उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP ब्रजलाल ने भी सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वह 2015 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। बाद में उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया गया और वह राज्यसभा भी पहुंचे।
अधिकारी से नेता बनने की राह क्यों दिखती है?
IAS या IPS अधिकारियों को प्रशासन, कानून-व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और शासन व्यवस्था का प्रत्यक्ष अनुभव मिलता है। सेवानिवृत्ति के बाद कुछ अधिकारी इसी अनुभव को सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में इस्तेमाल करने का फैसला करते हैं।
हालांकि किसी अधिकारी का प्रशासनिक अनुभव अपने आप चुनावी सफलता की गारंटी नहीं देता। चुनाव जीतने के लिए संगठन, स्थानीय राजनीतिक समीकरण, जनता से संपर्क, पार्टी का समर्थन और उम्मीदवार की अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता जैसे अनेक कारक भूमिका निभाते हैं।
इसी तरह किसी नेता के लिए सिविल सेवा परीक्षा में बैठना सैद्धांतिक रूप से अलग विषय है। यहां राजनीतिक पहचान से ज्यादा महत्वपूर्ण निर्धारित पात्रता, प्रतियोगी परीक्षा और चयन प्रक्रिया होती है।
राजभर की टिप्पणी पर आगे क्या?
ओमप्रकाश राजभर की टिप्पणी के बाद यह बहस जरूर तेज हुई है कि प्रशासनिक सेवा और राजनीति के बीच आने-जाने का रास्ता दोनों दिशाओं में कितना दिखाई देता है। फिलहाल सार्वजनिक जीवन में अधिकारी से नेता बनने के कई उदाहरण मौजूद हैं, जबकि स्थापित राजनीतिक जीवन से निकलकर IAS या IPS बनने का कोई व्यापक रूप से दर्ज उदाहरण सामने नहीं आता।
दिव्या मित्तल का राजनीतिक सफर आगे किस दिशा में जाता है और वह किस राजनीतिक दल या मंच से जुड़ती हैं, यह आने वाला समय बताएगा। वहीं राजभर की टिप्पणी पर उठी बहस ने एक अलग सवाल जरूर सामने ला दिया है—क्या प्रशासनिक सेवा और राजनीति के बीच आने-जाने के नियम और वास्तविक रास्ते दोनों दिशाओं में समान रूप से दिखाई देते हैं?
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