तानाशाह अफसर UP को भयावह राज में बदल देंगे… आकृति केस में हाई कोर्ट ने कहा – नोएडा DM ने निष्ठा तोड़ी

HIGHLIGHTS
प्रयागराज/नोएडा: दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लेने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने आकृति चौधरी के खिलाफ लगाई गई NSA हिरासत को रद्द करते हुए इसे कानून और संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ माना। कोर्ट ने उनके पक्ष में 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। इस रकम की वसूली मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से करने का निर्देश दिया गया है।
क्या है पूरा मामला?
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन से जुड़ा है। न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम और साप्ताहिक अवकाश जैसे मुद्दों को लेकर मजदूरों का आंदोलन चल रहा था। इसी आंदोलन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की 24 वर्षीय लॉ छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को पुलिस ने हिरासत में लिया था।इसके बाद आकृति पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA लगा दिया गया। NSA के तहत किसी व्यक्ति को बिना सामान्य आपराधिक मुकदमे के लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता है। प्रशासन की कार्रवाई को चुनौती देते हुए मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट ने NSA क्यों रद्द किया?
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान प्रशासन की ओर से पेश सामग्री की जांच की।अदालत को ऐसा ठोस और विश्वसनीय सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आकृति चौधरी ने लोगों को हिंसा, तोड़फोड़ या किसी गंभीर आपराधिक गतिविधि के लिए उकसाया था।कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री से आकृति के मजदूर आंदोलन के समर्थन में लोगों से जुड़ने और आंदोलन का समर्थन करने की अपील करने की बात सामने आती है। शांतिपूर्ण तरीके से विरोध या अपनी बात रखना अपने आप में NSA लगाने का आधार नहीं बन सकता।
नोएडा DM की भूमिका पर कोर्ट सख्त
हाई कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी मेधा रूपम की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट के मुताबिक, NSA लगाने से पहले डीएम को पुलिस की रिपोर्ट और उसके पीछे मौजूद सामग्री की स्वतंत्र एवं गहराई से जांच करनी चाहिए थी।
अदालत ने कहा कि यदि पुलिस रिपोर्ट में पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री नहीं थी, तो केवल रिपोर्ट के आधार पर इतने कठोर कानून का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था।कोर्ट ने यह भी माना कि NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करने से पहले जरूरी सावधानियां नहीं बरती गईं।
‘निष्ठा की शपथ’ को लेकर बड़ी टिप्पणी
अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारी पर भी बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आईएएस और आईपीएस जैसे पदों पर नियुक्त अधिकारी संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं।अदालत के मुताबिक अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक नेतृत्व के प्रति।कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर की डीएम को निष्ठा की शपथ के उल्लंघन की दोषी माना।
‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ को लेकर कोर्ट की चेतावनी
फैसले में कोर्ट ने अफसरशाही के कथित मनमाने और दमनकारी रवैये को लेकर बेहद गंभीर चेतावनी दी।
अदालत ने कहा कि अगर नौकरशाही का ‘तानाशाही’ रवैया जारी रहा और अधिकारी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को भूलकर मनमाने तरीके से शक्तियों का इस्तेमाल करते रहे, तो उत्तर प्रदेश एक ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ में बदल सकता है।’ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ का अर्थ ऐसे भयावह शासन या समाज से है, जहां सत्ता का नियंत्रण अत्यधिक बढ़ जाता है और नागरिकों की स्वतंत्रता तथा अधिकार लगातार सीमित होते जाते हैं।
5 लाख रुपये का मुआवजा, वेतन से होगी वसूली
हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
खास बात यह है कि अदालत ने इस आर्थिक बोझ को सरकारी खजाने पर डालने के बजाय मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से रकम वसूलने का निर्देश दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक इसमें नोएडा डीएम और NSA की कार्रवाई की सिफारिश करने वाले पुलिस अधिकारियों/SHO की भूमिका को जिम्मेदार माना गया है।अदालत ने संबंधित अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में भी कोर्ट की नाराजगी दर्ज करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने पुलिस की भूमिका पर भी उठाए सवाल
मामले में केवल जिलाधिकारी की भूमिका ही सवालों के घेरे में नहीं रही। कोर्ट ने पुलिस की रिपोर्ट और NSA लगाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. अदालत ने यह जांचा कि क्या आकृति के खिलाफ NSA लगाने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी और क्या सामान्य कानून के तहत कार्रवाई पर्याप्त नहीं थी।कोर्ट के अनुसार, NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल तभी किया जाना चाहिए जब उसके लिए कानूनी रूप से आवश्यक आधार मौजूद हों।
हिरासत और गिरफ्तारी के समय पर भी सवाल
मामले में कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि आकृति को 11 अप्रैल की शाम पुलिस ने हिरासत में लिया था, जबकि उनकी गिरफ्तारी 12 अप्रैल को दिखाई गई। इसके बाद 13 अप्रैल को हुई हिंसा के संदर्भ में भी सवाल उठा कि उससे पहले हिरासत में ली गई आकृति को उस हिंसा के लिए किस आधार पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
हाई कोर्ट का फैसला क्यों महत्वपूर्ण?
यह फैसला सिर्फ आकृति चौधरी की हिरासत तक सीमित नहीं माना जा रहा है। अदालत की टिप्पणियां प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अपनी शक्तियों के इस्तेमाल और उनकी जवाबदेही को लेकर व्यापक संदेश देती हैं।
कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि किसी अधिकारी के पास बड़ी प्रशासनिक शक्ति होना उसे कानून और संविधान से ऊपर नहीं करता। नागरिकों की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले कठोर कानूनों का इस्तेमाल करते समय अधिकारियों को उपलब्ध सबूतों और कानूनी शर्तों की स्वतंत्र जांच करनी होगी।
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