UP News : यूपी पुलिस को हाईकोर्ट की फटकार, 9 महीने में लाखों का मुआवजा-हर्जाना; जानिए किन मामलों में उठे सवाल

HIGHLIGHTS
इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने 2026 में ऐसे कई मामले पहुंचे, जिनमें पुलिस या प्रशासन की कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठे। इन मामलों में अदालत ने केवल यह नहीं देखा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई हुई या नहीं, बल्कि यह भी जांचा कि कार्रवाई करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं। न्यायिक आदेशों में हिरासत की अवधि, गिरफ्तारी की प्रक्रिया, अदालत के आदेशों का पालन, प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही जैसे पहलू सामने आए। इलाहाबाद हाई कोर्ट की आधिकारिक व्यवस्था में 2026 के फैसलों और आदेशों का रिकॉर्ड उपलब्ध है।
कमलेश कुमार मामला: पांच दिन की हिरासत पर ₹50 हजार
सितंबर में कमलेश कुमार से जुड़े मामले में हाई कोर्ट ने पुलिस हिरासत की अवधि को लेकर गंभीर सवाल उठाए। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने 15 अगस्त 2026 से गैरकानूनी हिरासत में रखे जाने का आरोप लगाया था। बाद की सुनवाई में पुलिस की ओर से हुई गलती स्वीकार किए जाने की बात भी सामने आई।
18 सितंबर के आदेश में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने राज्य को ₹50 हजार मुआवजा देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जिम्मेदारी तय होने के बाद यह रकम संबंधित लोगों से वसूलने की प्रक्रिया अपनाई जाए। कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों द्वारा गलती स्वीकार किए जाने को भी रिकॉर्ड पर लिया।
अनिल सोनी: गिरफ्तारी पर रोक के बावजूद कार्रवाई
29 मई को अनिल सोनी से जुड़े मामले में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। मामला उस कार्रवाई से जुड़ा था जिसमें अदालत के अंतरिम आदेश के बावजूद गिरफ्तारी की गई थी।
कोर्ट ने संबंधित SHO के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य सरकार को मुआवजे की रकम संबंधित अधिकारी से वसूलने की अनुमति भी दी गई। इस मामले में अदालत का जोर इस बात पर था कि न्यायालय द्वारा पारित आदेशों का पालन प्रशासनिक स्तर पर अनिवार्य है।
मंसूर अहमद: आठ दिन की हिरासत पर ₹2 लाख
जून में मंसूर अहमद से जुड़े मामले में हाई कोर्ट ने आठ दिन की गैरकानूनी हिरासत के लिए ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने ₹25 हजार प्रतिदिन की दर से राशि तय की।
मामले में कोर्ट ने संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच के बाद मुआवजे की रकम वसूलने की बात भी कही। इस आदेश ने पुलिस हिरासत में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के पालन के महत्व को फिर सामने रखा।
चंदर पाल सिंह: तीन दिन की हिरासत पर ₹75 हजार
चंदर पाल सिंह के मामले में अदालत ने तीन दिन से अधिक की गैरकानूनी हिरासत को लेकर ₹75 हजार मुआवजे का आदेश दिया था। बाद में 25 सितंबर 2026 के अनुपालन आदेश में अदालत के रिकॉर्ड में यह दर्ज हुआ कि ₹75 हजार की राशि याचिकाकर्ता को मिल चुकी है।
यह मामला यह भी दिखाता है कि अदालत के मुआवजे के आदेश के बाद उसकी अनुपालना की निगरानी भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन सकती है।
विनोद कुमार सिंह: वाहन जब्ती पर हर महीने ₹20 हजार
यह मामला सीधे पुलिस हिरासत का नहीं था, बल्कि वाहन की जब्ती और उससे जुड़े आर्थिक नुकसान से संबंधित था। 5 अगस्त 2026 के फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि यदि सरकारी कार्रवाई के कारण किसी व्यक्ति को उसकी वैध आजीविका से वंचित किया जाता है तो संवैधानिक अदालत सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा दे सकती है।
अदालत ने वाहन की वास्तविक रिहाई तक ₹20 हजार प्रतिमाह के हिसाब से आर्थिक नुकसान की भरपाई का आदेश दिया। इसके अलावा मानसिक परेशानी, आर्थिक दबाव और मुकदमेबाजी से हुई परेशानी के लिए ₹25 हजार अतिरिक्त देने को कहा गया।
अभिषेक त्यागी: गुंडा एक्ट की कार्रवाई पर ₹50 हजार
10 सितंबर को अभिषेक त्यागी के मामले में हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स/गुंडा नियंत्रण कानून के तहत की गई प्रशासनिक कार्रवाई को रद्द करते हुए ₹50 हजार डैमेजेज देने का आदेश दिया।
अदालत ने मामले के रिकॉर्ड और संबंधित कार्यवाही की समीक्षा के बाद कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में कार्रवाई को कायम नहीं रखा जा सकता। राज्य को रकम देने और संबंधित अधिकारियों से इसकी वसूली की अनुमति दी गई। यह मामला गैरकानूनी हिरासत से अलग था और प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता से संबंधित था।
₹10 लाख वाला मामला क्यों अलग है?
मनोज कुमार से जुड़े मामले में हाई कोर्ट ने तीन महीने से अधिक की कथित गैरकानूनी हिरासत और गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए जाने के मुद्दे पर ₹10 लाख की exemplary costs का आदेश दिया था। हालांकि, 22 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के ₹10 लाख भुगतान संबंधी आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी।
इन मामलों से क्या सामने आता है?
इन मामलों को एक साथ देखने पर एक बात स्पष्ट होती है कि अदालत ने पुलिस या प्रशासन की कार्रवाई को केवल उसके परिणाम के आधार पर नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया के पालन के आधार पर भी परखा।
गिरफ्तारी से पहले और बाद की प्रक्रिया, हिरासत की वैध अवधि, न्यायालय के आदेशों का अनुपालन, जब्त संपत्ति के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान और प्रशासनिक कानून के तहत कार्रवाई—इन सभी विषयों पर अदालत ने अलग-अलग मामलों में हस्तक्षेप किया। इनमे कुछ मामले सीधे पुलिस हिरासत से जुड़े हैं, जबकि कुछ प्रशासनिक कार्रवाई, संपत्ति जब्ती या अदालत के आदेश के पालन से संबंधित हैं।
2026 के इन आदेशों में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत पर जोर दिया है—किसी व्यक्ति के खिलाफ सरकारी कार्रवाई करते समय कानून में तय प्रक्रिया का पालन जरूरी है। जहां अदालत को प्रक्रिया में गंभीर चूक मिली, वहां उसने मुआवजे, हर्जाने, विभागीय जांच या रकम की वसूली जैसे उपाय अपनाए।
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